Shodh Manjusha: An International Multidisciplinary Journal

17. भारतीय शिक्षा प्रणाली का एकीकरण: प्राचीन ज्ञान के साथ भारत की शिक्षा का पुनरुत्थान, Integrating the Indian Education System: Revitalizing India’s Education with Ancient Wisdom

प्रस्तावना

प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली और साहित्य ने विश्व में गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त किया है। ज्ञान, दर्शन और शिक्षा में जितना योगदान भारत का है, उतना किसी अन्य देश का नहीं। प्राचीन प्राचीन समय में शिक्षा का उद्देश्य मानव के चरित्र और मूल्यों का विकास करना था। भारतीय ज्ञान, जो वर्तमान समाज को ध्रुव तारे की तरह दिशा प्रदान कर रहा है, भारतीय शिक्षा प्रणाली की विशेषताओं में गुरु-शिष्य संबंधों का गहरा महत्व था, जिसमें महिलाओं की शिक्षा को भी शामिल किया गया था। गुरुकुल प्रणाली भारत की प्राचीन शिक्षा प्रणाली है प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली में दो प्रकार के पाठ्यक्रम प्रचलित थे – आध्यात्मिक और भौतिक। इसमें नैतिक मूल्य, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत, मानव अधिकार और सामाजिक न्याय को महत्व दिया गया है। भारतीय साहित्य ने हमेशा सभी के कल्याण की कामना की है |

मुख्य बिंदु: शिक्षा प्रणाली ,ऋग्वेद ,साहित्य ,गुरुकुल प्रणाली ,वैदिक तकनीकी शिक्षा ,प्राणायाम ,संस्कृत विश्वविद्यालय ,आध्यात्मिक और पारंपरिक गणित |

प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली और साहित्य

प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली और साहित्य ने विश्व में गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त किया है। ज्ञान, दर्शन और शिक्षा में जितना योगदान भारत का है, उतना किसी अन्य देश का नहीं। प्राचीन भारतीय ज्ञान, जो वर्तमान समाज को ध्रुव तारे की तरह दिशा प्रदान कर रहा है, सदैव पथप्रदर्शक रहा है। वेदकालीन शिक्षा प्रणाली को भारत की सबसे प्राचीन शिक्षा प्रणाली माना जाता है, क्योंकि वेद साहित्य में ही ज्ञान, दर्शन आदि की परिभाषा की गई है। शिक्षा प्रणाली का उद्भव और विकास भारत में ही हुआ, और यही ज्ञान अन्य देशों में भी पहुंचा।

प्राचीन समय में शिक्षा का उद्देश्य मानव के चरित्र और मूल्यों का विकास करना था। भारतीय ज्ञान परंपरा के अनुसार जीवन को चार आश्रमों में विभाजित किया गया था – ब्रह्मचर्य आश्रम, गृहस्थ आश्रम, वानप्रस्थ आश्रम, और संन्यास आश्रम। इन आश्रमों में आध्यात्मिक ज्ञान, चरित्र निर्माण, प्रकृति के प्रति धार्मिक और दार्शनिक चिंतन को मुख्य स्थान दिया गया। भारतीय शिक्षा प्रणाली की विशेषताओं में गुरु-शिष्य संबंधों का गहरा महत्व था, जिसमें महिलाओं की शिक्षा को भी शामिल किया गया था।

भारतीय शिक्षा प्रणाली की प्रशंसा में कहा गया है:

ज्ञान से अमृत की प्राप्ति होती है। दुर्वाद के अध्याय 40 के 14 श्लोकों में इस शिक्षा प्रणाली का वर्णन मिलता है। शंकराचार्य ने कहा है कि बिना ज्ञान के मुक्ति संभव नहीं है। भर्तृहरि के अनुसार, “विद्या बिनाहि परशु” अर्थात विद्या वही है जो मानव को योग्य बनाए।

प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली में दो प्रकार के पाठ्यक्रम प्रचलित थे – आध्यात्मिक और भौतिक। मुण्डक उपनिषद के अनुसार, प्राचीन समय में विद्या दो प्रकार की होती थी – परा और अपरा। परा विद्या का संबंध आध्यात्मिक उन्नति से था और अपरा विद्या का संबंध भौतिक उन्नति से।

याज्ञवल्क्य ने 14 विधाओं का उल्लेख किया है:

  1. चार वेद (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद)
  2. सात वेदांग
  3. पुराण
  4. न्याय
  5. मीमांसा
  6. धर्मशास्त्र
  7. उपवेद (आयुर्वेद, धनुर्वेद, गंधर्ववेद, शिल्पवेद)

इनके अलावा, 64 कलाओं का अध्ययन भी किया जाता था। इनमें संगीत, गणना, नृत्य, यंत्र निर्माण, मूर्तिकला, पशुपालन, धनुर्विद्या, सर्पविद्या आदि शामिल थे।

गुरु और शिष्य के बीच गहरा और घनिष्ठ संबंध होता था। शिष्य गुरु को पिता समान मानते थे और गुरु शिष्य को उनके अधिकारों और कर्तव्यों से अवगत कराते थे। गुरुकुल से शिक्षा प्राप्त करने वाले शिष्यों को बहुत सम्मान प्राप्त होता था। प्राचीन भारत में प्रसिद्ध गुरुओं में धौम्य, कपिल, कण्व, रामदेव, सनक, परशुराम, वेदव्यास, गुरु सांदीपनि, गुरु द्रोणाचार्य आदि का उल्लेख मिलता है।

यह सही है कि भारतीय खगोलशास्त्रियों ने प्राचीन समय में खगोलशास्त्र में अद्वितीय योगदान दिया था।

आचार्य आर्यभट्ट ने यह सिद्ध किया था कि पृथ्वी गोल है और यह अपने अक्ष पर घूमती है, जो आज से 1000 साल पहले Isaac Newton द्वारा बताए गए सिद्धांत से कहीं पहले था। आर्यभट्ट ने सूर्य और चंद्र ग्रहणों के कारणों को भी स्पष्ट किया था और यह खगोलशास्त्र में उनके योगदान का महत्वपूर्ण हिस्सा था।

भृगु मुग्ध ने पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत को भी उद्घाटित किया था, जिसे पश्चिमी दुनिया ने बाद में अपनाया। उनके विचारों को पूरे विश्व में पढ़ा और अनुवादित किया गया।

भारतीय गणितज्ञ ब्राह्मगुप्त ने गणित के क्षेत्र में भी बहुत महत्वपूर्ण योगदान दिया था। उन्होंने पायथागोरस प्रमेय का प्रारंभिक रूप बताया था, जिसे बाद में पश्चिमी दुनिया में पायथागोरस के नाम से जाना गया। ब्राह्मगुप्त ने गणित में शून्य का महत्व भी बताया, जो आधुनिक गणना का आधार बना।

आर्यभट्ट ने ग्रहों की स्थिति का भी निर्धारण किया और आकाशगंगा के विविध घटकों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारियां दी। उनके द्वारा स्थापित सिद्धांतों ने विज्ञान और गणित के क्षेत्र में महान योगदान दिया।

  1. नालंदा विश्वविद्यालय (Nalanda University)
  • स्थान: नालंदा (वर्तमान बिहार राज्य, भारत)
  • स्थापना: गुप्त साम्राज्य के शासक कुमारगुप्त प्रथम (414-455 ई.) द्वारा की गई।
  • विशेषताएँ:
    • नालंदा प्राचीन भारत का सबसे बड़ा और संगठित विश्वविद्यालय था।
    • इसमें अध्ययन करने के लिए भारत और तिब्बत, चीन, कोरिया, जापान, श्रीलंका, इंडोनेशिया आदि देशों से छात्र आते थे।
    • विषय: बौद्ध धर्म, व्याकरण, तर्कशास्त्र, आयुर्वेद, गणित, ज्योतिष, खगोल विज्ञान, चिकित्सा, और दर्शनशास्त्र।
    • पुस्तकालय: इसका पुस्तकालय “धर्मगंज” के नाम से प्रसिद्ध था, जिसमें लाखों पांडुलिपियाँ थीं। यह तीन भागों में विभाजित था:
      1. रत्नसागर
      2. रत्नोदधि
      3. रत्नरंजक
    • यहाँ बौद्ध धर्म के महायान शाखा की शिक्षा प्रमुख थी।
    • प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग (Xuanzang) और इत्सिंग (I-Tsing) ने यहाँ अध्ययन किया और नालंदा की महत्ता का वर्णन किया।
  • विनाश:
    नालंदा को 12वीं शताब्दी में तुर्क आक्रमणकारी बख्तियार खिलजी द्वारा जलाकर नष्ट कर दिया गया था।
  1. तक्षशिला विश्वविद्यालय (Taxila University)
  • स्थान: तक्षशिला (वर्तमान पाकिस्तान, रावलपिंडी के निकट)
  • स्थापना: माना जाता है कि तक्षशिला 7वीं-6वीं शताब्दी ईसा पूर्व में स्थापित हुआ था।
  • विशेषताएँ:
    • तक्षशिला भारत का पहला संगठित शिक्षा केंद्र था।
    • विषय: वेद, पुराण, आयुर्वेद, धनुर्वेद, राजनीति, युद्धकला, खगोल विज्ञान, गणित, वास्तुकला, और संगीत।
    • प्रख्यात शिक्षक: आचार्य चाणक्य (कौटिल्य), आचार्य वात्स्यायन, और प्रसिद्ध चिकित्सक चरक।
    • यहाँ महाजनपद काल के समय से ही शिक्षा दी जा रही थी।
    • शिक्षा का माध्यम संस्कृत और प्राकृत था।
    • अध्ययन के लिए कोई आयु सीमा नहीं थी, और शिक्षा व्यक्तिगत रुचि व कौशल पर आधारित थी।
  • महत्वपूर्ण विद्यार्थी:
    • पाणिनी: संस्कृत व्याकरण के रचयिता।
    • चंद्रगुप्त मौर्य: मौर्य साम्राज्य के संस्थापक।
    • जीवक: प्रसिद्ध आयुर्वेद चिकित्सक।
  • विनाश:
    5वीं शताब्दी ईस्वी में हूण आक्रमणकारी के हाथों तक्षशिला नष्ट हो गया।
  1. वल्लभी विश्वविद्यालय (Vallabhi University)
  • स्थान: वल्लभी (वर्तमान गुजरात, भारत)
  • स्थापना: माना जाता है कि यह 6वीं शताब्दी ईस्वी में मैत्रक राजवंश के शासकों द्वारा स्थापित किया गया।
  • विशेषताएँ:
    • वल्लभी बौद्ध धर्म का महत्त्वपूर्ण शिक्षा केंद्र था, खासकर हीनयान परंपरा का।
    • विषय: धर्म, तर्कशास्त्र, कानून, प्रशासन, साहित्य, व्याकरण, चिकित्सा।
    • इसे गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद पश्चिमी भारत में शिक्षा का प्रमुख केंद्र माना जाता था।
    • इसका पुस्तकालय भी बहुत समृद्ध था।
  • विनाश:
    वल्लभी का पतन 8वीं शताब्दी ईस्वी में आक्रमणों के कारण हुआ।

इन केंद्रों का महत्त्व

  1. वैश्विक आकर्षण:
    इन विश्वविद्यालयों में विदेशों से विद्वान अध्ययन के लिए आते थे, जिससे भारत को “ज्ञान का केंद्र” कहा जाता था।
  2. भारतीय संस्कृति और विज्ञान का प्रसार:
    यहाँ पढ़ाई गई विषयवस्तु ने भारतीय संस्कृति, विज्ञान, और दर्शन को समृद्ध किया।
  3. धार्मिक सहिष्णुता:
    तक्षशिला, नालंदा, और वल्लभी जैसे केंद्रों में विभिन्न धर्मों के विषय पढ़ाए जाते थे।
  4. आधुनिक शिक्षा प्रणाली की नींव:
    इन प्राचीन संस्थानों ने संगठित शिक्षा प्रणाली की नींव रखी।

प्राचीन काल की शिक्षा प्रणाली और उसकी विशेषताएँ

प्राचीन काल की शिक्षा प्रणाली आदर्शवाद पर आधारित थी। बच्चों को अच्छे आचरण और व्यवहार की शिक्षा दी जाती थी। ऋषि-मुनि मानते थे कि जैसा आचरण करेंगे, वैसा ही हमारा जीवन संचालित होगा। शिक्षा का उद्देश्य छात्रों को एक आदर्श नागरिक बनाना था। गुरुकुल और तपोवन का वातावरण शांत, एकांत और प्राकृतिक था। बच्चों को अध्ययन के साथ-साथ प्रकृति की देखभाल करना भी सिखाया जाता था।

गुरुकुल शिक्षा प्रणाली में प्राकृतिक वातावरण में व्यवस्थाएँ बनाई जाती थीं, जैसे जल स्रोतों का निर्माण। इसके साथ ही, छात्रों को पारिवारिक परिस्थितियों का ज्ञान भी गुरुकुल शिक्षा के माध्यम से प्राप्त होता था। कोई भी वंचित नहीं रहता था। शिक्षा पूर्ण करने के बाद गुरु दक्षिणा के रूप में छात्रों से कोई शुल्क नहीं लिया जाता था। छात्र अपनी गुरु दक्षिणा गुरु को समर्पित करते थे, जो उनके आत्म-शुद्धि के रूप में होती थी।

आत्म-शुद्धि और विकारों को दूर करने के लिए तप, योग, और नियमों का पालन किया जाता था। विद्यार्थियों को अष्टांग योग का प्रशिक्षण दिया जाता था, जिसमें प्राणायाम, प्रत्याहार आदि नियमों का समावेश था। सभी विद्यार्थी इन नियमों का पालन करते थे और योग करते थे, जिससे मन और शरीर शुद्ध होता था।

गुरु और शिष्य के बीच गहरा और प्रगाढ़ संबंध था। गुरुदेव छात्रों की क्षमता और संभावनाओं पर विशेष ध्यान देते थे। प्राचीन काल में सम्मान शिक्षा प्रणाली प्रचलित थी।

  1. वर्ण व्यवस्था का महत्व:
    प्राचीन समय में वर्ण व्यवस्था प्रचलित थी। वर्ण व्यवस्था के संदर्भ में कहा गया है:
    “जन्मना जायते शूद्रः संस्कारात् द्विज उच्यते”
    अर्थात, मनुष्य जन्म से शूद्र होता है और संस्कारों के कारण श्रेष्ठ बनता है। यह बात श्रीमद्भगवद गीता में भी कही गई है।

भारतीय साहित्य ने हमेशा सभी के कल्याण की कामना की है और “वसुधैव कुटुंबकम” की अवधारणा दी है, जिसका अर्थ है कि पूरा विश्व एक परिवार है। यह अवधारणा भारतीय नृत्य और दार्शनिक परंपरा के साथ-साथ यह विश्वास भी प्रकट करती है कि हम सभी इस विचार से जुड़े हुए हैं। “वसुधैव कुटुंबकम” में सार्वभौमिक भाईचारा, शांति, सद्भावना और मानवता की बात की गई है। इसमें नैतिक मूल्य, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत, मानव अधिकार और सामाजिक न्याय को महत्व दिया गया है।

प्राचीन शिक्षा प्रणाली में ऋषि-मुनियों ने यह संदेश दिया कि सभी मनुष्यों का सम्मान होना चाहिए और यह हर व्यक्ति का कर्तव्य है कि वे एक-दूसरे के विकास में सहायक बनें ताकि मानवता का विकास हो सके। भारतीय संस्कृति और परिवार का चित्रण रामायण के माध्यम से भी किया गया है।

प्राचीन शिक्षा प्रणाली में संयुक्त परिवार को संपूर्ण परिवार माना गया है। संयुक्त परिवार के दौरान, परिवार के अन्य सदस्य आर्थिक संकट और गंभीर बीमारी के समय एक-दूसरे की मदद करते थे। कार्यों के विभाजन के कारण हर व्यक्ति तनावमुक्त रहता था और अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त होकर कार्य करता था। माता-पिता, बच्चों, दादा-दादी और परिवार के बुजुर्ग परिवार के छोटे सदस्यों की देखभाल करते थे और उन्हें चरित्र निर्माण और अच्छे आचरण का पाठ पढ़ाते थे।

संयुक्त परिवार में समाजवादी भावना भी विकसित होती थी। परिवार के सदस्य भारतीय संस्कृति को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाते थे। परिवार के बुजुर्ग लोककथाओं, कहानियों और त्योहारों के माध्यम से बच्चों को सिखाते थे। हर सदस्य पर नजर रखी जाती थी ताकि सभी चरित्रवान बने रहें और परिवार के सामूहिक अनुशासन का पालन करें।

गुरुकुल प्रणाली और आधुनिक तकनीकी शिक्षण उपकरणों का एकीकरण

गुरुकुल प्रणाली भारत की प्राचीन शिक्षा प्रणाली है, जिसमें शिक्षा केवल किताबों तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह व्यावहारिक जीवन के अनुभवों, नैतिक मूल्यों, और व्यक्तिगत अनुशासन पर आधारित थी। शिक्षक (गुरु) और शिष्य के बीच एक गहन व्यक्तिगत संबंध था, जो केवल ज्ञान के आदान-प्रदान तक सीमित नहीं था, बल्कि जीवन के हर पहलू में मार्गदर्शन प्रदान करता था।

  • आज की प्रासंगिकता:
    • इस प्रणाली में शिष्य प्रकृति के करीब रहते थे और जीवन में सरलता व अनुशासन को अपनाते थे। इसे आज की शिक्षा में “एक्सपीरिएंशल लर्निंग” (अनुभव आधारित शिक्षा) और “स्टूडेंट-सेंटर्ड अप्रोच” के रूप में लागू किया जा सकता है।
    • आज की तकनीक, जैसे स्मार्ट क्लास, ऑडियो-वीडियो लेक्चर, और वर्चुअल रियलिटी, गुरुकुल प्रणाली के व्यावहारिक शिक्षण को और प्रभावी बना सकती है। उदाहरण के लिए, वर्चुअल रियलिटी का उपयोग छात्रों को प्राचीन धरोहरों, भौगोलिक संरचनाओं, या वैज्ञानिक प्रक्रियाओं को दिखाने के लिए किया जा सकता है।

वैदिक गणित और आधुनिक गणित का समन्वय

वैदिक गणित भारत की प्राचीन गणना प्रणाली है, जिसे ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, और अथर्ववेद जैसे ग्रंथों से लिया गया है। वैदिक गणित में गणना करने के लिए सरल और तेज़ विधियों का उपयोग किया जाता है। यह मानसिक गणना के विकास में सहायक है और गणित को अधिक रुचिकर बनाता है।

  • आज की शिक्षा में उपयोगिता:
    • वैदिक गणित की विधियां, जैसे ‘विकल्प विभाजन’ और ‘तर्जनी गणना,’ बच्चों को मानसिक रूप से तेज बनाती हैं और उनकी समस्या-समाधान की क्षमता को बढ़ाती हैं।
    • प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं (जैसे बैंकिंग, एसएससी) में वैदिक गणित की त्वरित गणना तकनीक अत्यधिक उपयोगी है।
    • इसे आधुनिक गणितीय अवधारणाओं, जैसे बीजगणित, त्रिकोणमिति, और कैलकुलस, के साथ पूरक बनाया जा सकता है, जिससे छात्रों को प्राचीन और आधुनिक दोनों दृष्टिकोणों का लाभ मिलेगा।

योग और ध्यान का पाठ्यक्रम में समावेश

योग और ध्यान भारत की प्राचीन परंपराओं का हिस्सा हैं, जिनका उल्लेख पतंजलि के योग सूत्र और उपनिषदों में मिलता है।

  • योग: यह केवल शारीरिक व्यायाम नहीं है, बल्कि मन, शरीर, और आत्मा का संतुलन बनाए रखने की प्रक्रिया है।
  • ध्यान: यह मानसिक शांति, ध्यान केंद्रित करने की क्षमता, और तनाव प्रबंधन के लिए अत्यधिक प्रभावी है।
  • आधुनिक शिक्षा में उपयोगिता:
    • छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए नियमित योग सत्र आयोजित किए जा सकते हैं। यह परीक्षा के समय के तनाव को कम करता है।
    • ध्यान का उपयोग छात्रों की एकाग्रता बढ़ाने और भावनात्मक स्थिरता विकसित करने के लिए किया जा सकता है।
    • केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) और अन्य राज्य बोर्ड पहले से ही योग और ध्यान को पाठ्यक्रम में शामिल कर चुके हैं, और इसका सकारात्मक प्रभाव देखा गया है।

प्रामाणिकता और प्रमाण:

  1. वैदिक गणित: “वैदिक गणित” नामक पुस्तक (लेखक: जगद्गुरु श्री भारती कृष्ण तीर्थजी) इसके प्रभाव और उपयोगिता पर विस्तृत जानकारी प्रदान करती है।
  2. योग: संयुक्त राष्ट्र ने 21 जून को “अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस” घोषित किया, जो इसकी वैश्विक स्वीकार्यता और प्रभाव को दर्शाता है।
  3. गुरुकुल प्रणाली: टैगोर के शांति निकेतन और श्री अरबिंदो के शिक्षण मॉडल गुरुकुल प्रणाली से प्रेरित हैं और आधुनिक शिक्षा में इसकी प्रासंगिकता को दर्शाते हैं।

निष्कर्ष:
वर्तमान में, आधुनिक तकनीकी शिक्षण उपकरणों के साथ गुरुकुल प्रणाली के सिद्धांतों का समन्वय शिक्षा प्रणाली को अधिक प्रभावी बना सकता है।गुरुकुल प्रणाली और आधुनिक तकनीकी उपकरणों के एकीकरण से एक ऐसी शिक्षा प्रणाली का विकास हो सकता है, जो न केवल तकनीकी रूप से उन्नत हो, बल्कि सांस्कृतिक, नैतिक, और व्यावहारिक दृष्टि से भी सशक्त हो। इससे छात्रों का समग्र विकास संभव होगा और शिक्षा को सामाजिक और वैश्विक चुनौतियों का सामना करने में सक्षम बनाया जा सकेगा।

संदर्भ:

  1. ह्वेनसांग की यात्रा कथाएँ (सी यूंग च्वांग, 7वीं शताब्दी)।
  2. इत्सिंग का यात्रा वृत्तांत।
  3. महावंश और दीपवंश (श्रीलंकाई ग्रंथ)।
  4. “नालंदा: द ब्लैक होल ऑफ हिस्ट्री” (मार्क केन)
  5. “तक्षशिला एंड इट्स वर्ल्ड” (रोमिला थापर)
  6. बौद्ध ग्रंथ और जैन ग्रंथ (त्रिपिटक, कल्पसूत्र)।
  7. ऋग्वेद संहिता 5वां प्रमाण पत्र वेद संशोधन बोर्ड पुणे 1933
  8. , मनुस्मृति: मनु प्रभात प्रकाशन दिल्ली 2020
  9. वायु पुराण का अनुवाद रामप्रताप त्रिपाठी शास्त्री, हिंदी साहित्य सम्मेलन इलाहाबाद 1987,
  10. कौशांबी डी.डी., प्राचीन भारत की संस्कृति और सभ्यता: राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली 1990
  11. मूल्य गुणा विज्ञान: राजकमल प्रकाशन दिल्ली 2017,
  12.  ओझा डी.डी., विज्ञान और वेद: वैज्ञानिक प्रकाशक जोधपुर 2005

Abstract

The ancient Indian education system and literature have earned a place of pride in the world. India’s contributions to knowledge, philosophy, and education are as remarkable as their contribution to the world.No other country has as much. In ancient times, the purpose of education was to develop human character and values.Indian knowledge, which is guiding the present society like the pole star, had a deep significance of Guru-Shishya relationship in the characteristics of Indian education system, which also included the education of women.The Gurukul system is an ancient Indian education system, offering two types of curriculum: spiritual and material. It focused on moral values, cultural and spiritual heritage,Human rights and social justice are given importance. Indian literature has always sought the welfare of all.

Peer-Review Method

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Competing Interests

The author/s declare no competing interests.

Funding

This research received no external funding.

Data Availability

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