Shodh Manjusha: An International Multidisciplinary Journal

12. भारतीय परिवेश में लोक संगीत का स्थान, Place of Folk Music in the Indian Context

शोध सारांश

भारत भौगोलिक दृष्टि से विविधतापूर्ण राष्ट्र है और यह विविधता भारतीय संस्कृति में भी प्रतिबिम्बत है। हमारे प्रत्येक राज्य में संगीत का अपना ही रूप है। यह उनके सांस्कृतिक प्रतिज्ञान का आधार है। जहां नाट्यशास्त्र में दिए गए नियमों का पालन किया जाता है और गुरु-शिष्य (छात्र-गुरु) परंपरा का पोषण किया जाता है वहीं लोक संगीत लोगों का संगीत है और इसका कोई कठोर नियम नहीं हैं। लोक संगीत विविध विषयों पर आधारित होते हैं और संगीत की लय से भरपूर होते हैं। यह तालों पर भी टिके हो सकते हैं। राज्य विशेष से जुड़े कई प्रकार के लोक संगीत होते हैं।1 लोक संगीत किसी स्थान विशेष की धरोहर न होकर आज खुले प्रांगण में गाया जाता है। आवागमन की सुलभता एवं दूरदर्शन, रेडियो की सुविधा ने एक प्रदेश के संगीत को जन समुदाय के लिए सुलभ किया है। आज जगह-जगह लोकोत्सवों का आयोजन होता है, जिसमें भारत के विभिन्न प्रदेशों से लोक कलाकार अपने-अपने लोक गीतों एवं नृत्यों की शैलियों को लाते हैं। लोक संगीत जन-जीवन में व्याप्त है। किसी भी देश प्रदेश का संगीत उसके लोक जीवन की सभ्यता-संस्कृति का दर्पण है। लोक संगीत और लोक संस्कृति का अटूट सम्बन्ध है तथा लोक संस्कृति को लोक संगीत से अलग नहीं किया जा सकता। इसी आधार पर कुछ बातें कही जा रही हैं।

शब्द कुंजी – परिहन, भावर, दोहद, महींआ, वर्षारंभ महिमामंडन ।

उत्तर प्रदेश का लोकसंगीत:

‘उत्तर प्रदेश के विभिन्न प्रान्तों में सांस्कृतिक एवं सांगीतिक दृष्टि से एक महत्त्वपूर्ण भूखण्ड है। यह लोकसंगीत, लोक कलाओं आदि सभी में अपनी परम्परा, रीति-रिवाज व रुचियों को अभिव्यक्त कर देता है। यह प्रदेश अपने ग्रामीण जीवन व साहित्यिक दृष्टि से सम्पन्न प्रदेश है। उत्तर प्रदेश के भिन्न-भिन्न अंचलों का संगीत अपनी मनमोहक छटा से इस प्रदेश को एकता के सूत्र में बाँधता है। उत्तर प्रदेश का क्षेत्रफल अधिक है। अतः यहाँ पर कई प्रकार की संगीत शैलियाँ प्रचलित हैं; जैसे-अवध, ब्रज, गढ़वाली, कुमाऊँ तथा भोजपुरी लोकगीत हैं। कहा जाता है कि बीस कोस पर पानी बदल जाता है अतः भाषा में अन्तर होने से संगीत में भी अन्तर हो गया। उत्तर प्रदेश को लोकसंगीत की खान कहा जा सकता है।

भोजपुरी लोकसंगीत:

उत्तर प्रदेश में लोकगीतों में भोजपुरी लोक गीत अपना विशेष महत्त्व रखते हैं। भोजपुरी बोली हिन्दी की बोलियों में अपना विशिष्ट स्थान रखती है। भोजपुरी लोकगीतों में समग्र जन जीवन का जीवन-चित्रण उजागर रहता है। भोजपुरी गीतों का वर्णन उनकी गुणवत्ता के आधार पर श्रमगीत, संस्कार गीत व सांस्कृतिक गीत इस प्रकार किया गया है। इन श्रम गीतों को खेतों में किसान व मजदूर लोग काम करते समय अपनी थकान दूर करने के लिए एक स्वर में गुन-गुनाते हैं यही यहाँ के श्रम गीत हैं। इन गीतों में जन-जीवन की चर्चा का आधार स्पष्ट होता है। संस्कार गीतों के अन्तर्गत प्रत्येक अवसर पर लोक-गीत गाए जाते हैं। जिनमें प्रमुख तिलक, शगुन, देवी गीत, मंगल विवाह, सुहाग, जोग, बन्ना बन्नी उठान, गारी, मीट कोवड़ा, माण्डों, पाकी पूजना, ओखला पूजन, हरदी उबटन संज्ञा, कोहबर, पराते चउक के गीत, परिहन के गीत, भावर, दोहद, सोहर, मुण्डन, जनेऊ, हरदी, संज्ञा-पराती, मातृ-पूजन, पितृ-पूजन, कंकन, छुड़ाना आदि को गाने की प्रथा से तथा सांस्कृतिक गीतों के अन्तर्गत व्रत एवं त्योहार व मेलों उत्सवों में गाए जाने वाले गीत होते हैं, जो प्रत्येक अवसर पर गाए जाते हैं। इन गीतों में यहाँ के क्षेत्रीय जीवन की झाँकी देखने को मिलती है।

हरियाणा का लोकसंगीत

‘हरियाणा पंजाब और राजस्थान के समीप का प्रान्त है। यहाँ पर पंजाब के शौर्य और राजपूतों का स्पष्ट दिग्दर्शन होता है। हरियाणा के संगीत पर दृष्टिपात करें, तो उसमें पंजाब के संगीत की भीनी महक आती है। यहाँ का लोकसंगीत हरियाणवी लोक-संस्कृति का प्रतीक है। हरियाणवी लोकसंगीत की गायकी एक ओर यहाँ के राग होली तथा नगाड़ा वादन से प्रकाशित होती हैं वहीं दूसरी ओर आल्हा जैसे लोक रागों तथा मुक्तक लोकगीतों के द्वारा आलोकित होते हैं। हरियाणवी लोकसंगीत के अनेक ऐसे गीत हैं। जिनके माध्यम से यह संगीत सजीव, सशक्त और मुखर है।  यहाँ के लोकगीत इन आयामों में अपना सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं। विविध संस्कारों, पर्वों, ऋतुओं आदि अवसरों पर यह लोकगीत अपनी विभिन्न छटा में गाए जाते हैं। यहाँ के लोकगीतों में विवाह से सम्बन्धित गीत अधिक मिलते हैं।’

उत्तराखंड का लोक संगीत

गढ़वाली लोकसंगीत

उत्तराखण्ड के पहाड़ी भाग जहाँ की संस्कृति में गीत-संगीत बसा हुआ है। गढ़वाली जीवन एक प्रकार से सम्पूर्ण भारत का अंग बन गया। यहाँ के लोकगीतों व लोक नृत्यों में भारत के अनेक आँचलों की छाप दिखाई देती है। गढ़वाल में लोकगीतों का बहुत महत्त्व है, यहाँ प्रत्येक अवसर लोकगीत गाकर पूर्ण होते हैं। देवी-देवताओं से सम्बन्धित गीतों को मांगल गीत कहा जाता है। यह गढ़वाल का सबसे पुराना गीत है।

कुमाऊँ लोकसंगीत

‘कुमाऊँ उत्तराखण्ड का एक छोटा-सा पहाड़ी भाग है। यहाँ अनेक जातियों-प्रजातियों का सम्मिश्रण है, जो यहाँ की संस्कृति एवं संगीत को प्रभावित करते हैं। कुमाऊँ में प्रचलित संस्कार गीत इस बात का प्रमाण है कि इस जनपद में बाहर से आने वाले लोग चाहे ब्राह्मण हो, राजपूत हो या वैश्य सबने यहाँ की प्रचलित बोली को ही अपना लिया है। यहाँ के संस्कार गीत-भाव, भाषा, वर्ण्य विषय की दृष्टि से लोक धारा से भिन्न हैं, परन्तु भाषा की दृष्टि से उन्हें कुमाऊँ के अनुरूप ढाल दिया गया है। कुमाऊँ का लोक गीत इस प्रकार है “जागर गीत” जिसमें सामाजिक उत्पीड़न दृष्टव्य होता है तथा यहाँ देवी-देवताओं की पूजा सम्बन्धी गीतों का वर्णन अधिक मिलता है। कुमाऊँ के लोग अन्ध विश्वास अधिक रखते हैं। यहाँ के लोकगीतों को जातियों के अनुसार विभाजित पाया जाता है। संस्कार गीत जिसमें विशेषकर कर्मगीत केवल ब्राह्मण परिवारों में ही गाया जाता है तथा ऋतु गीत जिसमें विशेषतौर से बारहमासा ऋतुरैणा और बसन्त गीत केवल हरिजन परिवार के लोग ही गाते हैं। “इन गीतों को गाने वाले ‘हुड़किया’ या बादी कहलाते हैं।’ 2

हिमाचल प्रदेश का लोकसंगीत

‘हरे भरे खेत, हिम शिखरों से सुसज्जित ऊंचे घने वृक्ष, स्वच्छ कल-कल बहती नदियाँ, हिमाचल प्रदेश का अद्वितीय श्रृंगार है यहाँ के बहुरंगी लोकगीत। यह लोकगीत विशेष अवसरो पर तो गाए जाते हैं साथ ही दैनिक जीवन में गूंजती यहाँ की स्वर लहरियाँ मन को आनन्द विभोर कर देती हैं। हिमाचल प्रदेश के गीतों को ‘नाटी’ भी कहा जाता है। अधिकांश नारियाँ नृत्य गीत गाती है। हिमाचल का लोक गीत आज भी ग्रामीण समुदाय के मनोरंजन का साधन है। हिमाचल प्रदेश के प्रमुख लोकगीतों में बुढडमामा, बरलाज, हारे आदि हैं। ख्याल गीत-संगीत प्रधान लोकनाट्य है। हिमाचल प्रदेश में स्वांग तथा रासलीला एवं रामलीलाओं का विशेष प्रचलन है। प्रत्येक त्योहार तथा मेलों के अवसरों पर इनका आयोजन होता है। हिमाचल प्रदेश में वैवाहिक संस्कारों के अवसर पर मांगलिक स्वांग गाए जाते हैं, जिन्हें झमाकड़ा मझाकड़ा. स्वांग कहते है यह मूलतः स्त्रियों का स्वांग है। इस स्वांग में स्त्री विवाह की प्रारम्भिक तैयारी से लेकर बिदाई तक सभी प्रयाओं पर नृत्य गीत एवं भाव-अभिनय के साथ सामूहिक हर्षोल्लास अभिनीत करती हैं। वर पक्ष के लोगों में झमाकड़ा स्वांग तथा दुल्हन पक्ष के यहाँ मझाकड़ा स्वांग की प्रथा है। विवाह जैसे मांगलिक संस्कार पर झमाकड़ा मझाकड़ा मनोरंजन का विशिष्ट साधन है।

हिमाचल प्रदेश में उत्सव एवं त्योहार प्रेम-दर्शनीय हैं। ऋतु परिवर्तन के साथ-साथ यहाँ मेलो एवं त्योहारों का सिलसिला जारी रहता है। विभिन्न सांस्कृतिक परम्पराओं से सम्बद्ध इन मेलों में पावत्य लोकगीतों, नृत्य एवं अभिनय की त्रिवेणी बहती हैं। सर्वप्रथम चैत्रमास से पहाड़ी लोको का शुभारम्भ होता है तथा इन मेलों में स्वांग खेले जाते हैं, जिनमें प्रमुख स्वांग है-चैबोल खोन, होरिगको, रली, बसोह, भेड़, मुन्नी आदि। हिमाचल प्रदेश का लोक जीवन लोकगीतों, लोकनाट्य से परिपूर्ण है। यहाँ प्रत्येक पर्व एवं उत्सवों पर लोकगीतों एवं गान की परम्परा है। चारों ओर बर्फ से ढका हिमाचल प्रदेश संस्कृति, त्योहार एवं पर्वो के लिए प्रसिद्ध है, जहाँ प्रत्येक पर्व और त्योहार गीत संगीत के माध्यम से मनाए जाते हैं।

पंजाब का लोक संगीत

पंजाब सीमान्तवर्ती प्रान्त है। यहां के लोग युद्ध के समय सदैव ही प्रहरी की भाँति देश की सेवा के लिए तत्पर रहते हैं। शान्ति के समय लोकगीतों एवं नृत्य के द्वारा हर्षोल्लास के साथ अपना समय व्यतीत करते है। लोकसंगीत किसी भी संस्कृति का न महत्त्वपूर्ण अंग है। लोकगीत और उसका गायन जन साधारण के हृदय में स्थित भावनाओं की अभिव्यंजना का सरलतम माध्यम है। प्रत्येक प्रान्त का अपना स्वतन्त्र लोकसंगीत है।

पंजाब का लोकसंगीत अपनी ही विशेषताओं के कारण समस्त भारत में लोकप्रिय है। इसी पंजाब क्षेत्र के टप्पा, महींआ, मिर्जा साहिब, हीर, ढोलक के गीत बारहमासा गीत, बोलीआ आदि की लोकप्रियता समस्त भारत में है।

राजस्थान का लोकसंगीत

‘राजस्थान राजपूतों की वीर भूमि है, जिन्होंने विदेशियों से देश की रक्षा का भार अपने कन्धों पर उठाया था। यह जाति मुसलमानों के आगमन के साथ ही प्रकाश में आई। इतिहास साक्षी है कि राजपूतों ने मुस्लिम शासकों को कभी चैन से राज्य नहीं करने दिया। मुगल उसी समय भारत में अपना राज्य स्थापित कर सके, जब इन्होंने राजपूतों को अपना मित्र बना लिया। राजपूतों का अधिकांश समय युद्धों में व्यतीत होता था, परन्तु वह संस्कृति के रक्षक भी थे। शान्ति के समय में उन्होंने संगीत, साहित्य और कलाओं को संरक्षण प्रदान किया। अतः राजस्थान का संगीत अपनी अलग ही विशेषता रखता है।’ 3

मांड

‘यह राजस्थान राज्य का लोक संगीत है। कहा जाता है कि इसका विकास राजदरबारों में हुआ था और इसलिए यह शास्त्रीय परिधि में मान्यता प्राप्त है। इसे न तो पूर्ण राग के रूप में स्वीकार किया जाता है और न ही इसे स्वतंत्रप प्रस्तुत लोक गीतों में गिना जाता है। सामान्यतः इन गीतों का विषय राजपूत शासकों की महिमा का गान करना है। यह लगभग ठुमरी और ग़ज़ल से मिलता-जुलता है। केसरिया बालम’ जैसा प्रसिद्ध “मांड” लोकसंगीत में गाया गया है।

पनिहारि

यह लोक गीत राजस्थान राज्य से है और विषयगत रूप से पानी से संबंधित है। यह गीत सामान्यतः पास के कुएं से पानी लाने वाली और वापस अपने घरों में अपने सिर पर मटकों में पानी ले जाने वाली महिलाओं के विषय में होता है। यह गीत सामान्यतः पानी की कमी और कुएं और गांव के बीच की लंबी दूरी के विषय में होता है। कभी-कभी इन गीतों में गांव के कुएं के पास झुण्ड लगाए गांव की महिलाओं की  दैनिक चिंताओं के विषय में भी चर्चा होती है।

अन्य अवसरों पर, गीत प्रेमियों के बीच संयोगिक मिलन पर भी केंद्रित होते हैं. इसलिए ये श्रृंगार रस को साँझा करते हैं। इनमें कभी-कभी सास और बहू के बीच विवादास्पद संबंधों के विषय में भी चर्चा होती है।’ 4

बंगाल का लोकसंगीत

‘शास्त्रीय संगीत में तो पश्चिम बंगाल एवं उत्तर भारत की एक जैसी परम्परा है। ग्राम या लोकसंगीत में बंगाल देश के क्षेत्र अन्य किसी से पीछे नहीं हैं। संगीत बंगाल के ग्रामीणों का प्राण है। घरबाहर व कामकाज सबके लिए यहाँ अलग-अलग गीत हैं। लोकसंगीत प्राय: सप्तक के दो-तीन स्वरों में गाए जाते हैं। बंगाल के ग्राम गीतों में रागों की छाप दिखाई देती है विशेष तौर पर जागरण व कीर्तन लोकगीतों की श्रेणी में नहीं आते, परन्तु ये मानना पड़ेगा कि बंगाल के लोकगीत में बंगाली टप्पे का मेल है।

बंग्ला लोकसंगीत में विविधता बहुत है, कुछ गीतों में ताल व लय की प्रधानता है, कुछ जोशीले व जानदार हैं, तो कुछ गम्भीर । ऐसे भी असंख्य गीत हैं जिनमें किसान के जीवन की छोटी-सी छोटी बातों का वर्णन है। बंगाल का भटियाली किसानों व मल्लाहों का गीत है। सारी भटियाली से बिल्कुल विपरीत है, यह ऐसे काम करते समय गाया जाता है, जिनमें ताल की जरूरत होती है। बाउल वास्तव में एक सम्प्रदाय है, उसी के नाम पर उसके गीतों का नाम भी बाउल पड़ गया। बौद्ध प्रभात के कारण बाउल ईश्वरवादी नहीं थे। आगे भी उन्होंने योग साधना का मार्ग पकड़ा, जिसमें भक्ति की आवश्यकता नहीं थी।’5

बाऊल

‘यह न केवल संगीत का एक प्रकार है बल्कि बंगाली धार्मिक संप्रदाय भी है। बाऊल का संगीत यानी बाऊल संगीत एक विशेष प्रकार का लोक गीत है। इसके गीतों पर हिंदू भक्ति आंदोलन का खासा प्रभाव दिखाई देता है। यह संगीत पश्चिम बंगाल, असम तथा त्रिपुरा में गीतों के माध्यम से रहस्यवाद का उपदेश देने की लंबी विरासत का प्रतिनिधित्व करता है। वे मुख्य रूप से हिन्दू या सूफ़ी मुस्लिम संप्रदायों से सम्बंधित है। इस संगीत के मुख्य प्रतिपादक है: जतिन दास, पूर्णो चंद्र दास, लालोन फकीर, नबोनी दास और सनातन दास ठाकुर बाउल।’6

महाराष्ट्र का लोकसंगीत

यहाँ के लोकसंगीत में विभिन्न अवसरों पर गाए जाने वाले विभिन्न लोकसंगीत प्रचलित हैं। धान कूटते समय, खेत खलियान में काम करते समय, कपड़े धोते समय तथा श्रावण माह में झूलते समय गीत गाए जाते हैं। सावन का महीना त्योहारों व वर्षा ऋतु के कारण हिन्दुओं में सर्वाधिक महत्त्व रखता है, उल्लास व मादकता का वातावरण जितना इस माह में देखा जाता है उतना अन्य किसी में नहीं, महाराष्ट्र की स्त्रियाँ सावन के महीने में मंगलागौर का पूजन करती हुई गीत गाती हैं।’7

ओवी

यह संगीत महाराष्ट्र और गोवा से संबंध रखता है। सामान्यतः यह महिलाओं का गीत है जिसे उनके द्वारा अवकाश के समय या जब वे अपने घर का काम कर रही होती हैं, गाया जाता है। इनमें सामान्यतः कविता की चार छोटी पंक्तियां होती हैं। ये सामान्यतः विवाह, गर्भधारण के लिए तथा बच्चों की लोरी के लिए लिखे जाने वाले गीत होते हैं।8

लावणी

‘यह महाराष्ट्र के सबसे प्रसिद्ध लोक नृत्यों में से एक है। यह महाराष्ट्र में लोक संगीत की सबसे लोकप्रिय शैलियों में से भी एक है। यह पारंपरिक नृत्य और गीत का संयोजन है। सामान्यतः ढोलकी की ताल पर इसका प्रदर्शन किया जाता है। शक्तिशाली लय और -ताल के कारण यह संगीत पूर्ण रूप से नृत्य के लिए उपयुक्त हैं तथा सुनिश्चित करता है कि हर कोई आनंद के साथ इसका लुत्फ उठाए।

पोआड़ा

यह भी महाराष्ट्र राज्य में उभरने वाले लोक गीत का एक प्रकार है। ये सामान्यतः शिवाजी जैसे नायकों के लिए गाए जाने वाले वीरगाथा गीत हैं। इन गीतों में उनके गौरवशाली अतीत की घटनाओं और उनके वीरतापूर्ण कृत्यों का वर्णन होता है।

भावगीत

ये कर्नाटक और महाराष्ट्र में आम जनता के बीच बहुत ही लोकप्रिय भावनात्मक गीत है। संगीत के रूप में, ये ग़ज़ल के बहुत समीप हैं और इन्हें धीमें स्वरमान पर गाया जाता है। इसकी रचना के विषय प्रेम तथा दर्शन से संबंधित है।

मांडो

यह गोवा में लोकप्रिय है और इसमें भारतीय और पश्चिमी संगीत परम्पराओं का अनूठा मिश्रण है। इसमें उपयोग किये जाने वाले वाद्य यंत्रों में गिटार, वायलिन और घूमोट ड्रम सम्मिलित है।’9

कश्मीर का लोकसंगीत

‘कश्मीर को भारत का स्वर्ग कहा जाता है, जो उत्तर- भारत का प्राकृतिक सौन्दर्य से परिपूर्ण क्षेत्र है। प्राकृतिक परिवेश ने कश्मीर के लोक जीवन को स्फूर्ति ही नहीं दी है अपितु सौन्दर्यानुभूति भी प्रदान की है। यहाँ के ग्राम्य जीवन का एक महत्त्वपूर्ण अंग यहाँ का लोकसंगीत है। प्राकृतिक चित्रण के साथ-साथ यहाँ का सांस्कृतिक चित्रण भी बहुत मनोरम है। यहाँ के कृषक धान के हरे-खेतों की निराई करते समय यहाँ के सामूहिक स्वरों में गाए गए गीत आकाश को स्पर्श कर मोहक वातावरण उत्पन्न करते हैं।

ये गीत उनकी आशा और उल्लास के प्रतीक हैं। इन लोकगीतों में उनका प्राकृतिक प्रेम व हृदय की मानवीय भावनाएँ झलकती हैं। कश्मीरी जनजीवन के ये गीत उतने ही पुराने हैं, जितनी यहाँ की संस्कृति। इन लोकगीतों में सरसता, सरलता व हृदय के मधुर उद्गारों के स्पष्ट दर्शन होते हैं। कश्मीरी लोकगीतों के कई प्रकार प्रचलित हैं, जिनमें रोफ, छकरी, निमाई आदि संस्कारों से सम्बन्धित हैं वैसे तो प्रकृति की प्रत्येक ऋतु सुहानी होती है। बसन्त ऋतु के शुगुफे तथा पतझड़ की कुडम छटा की रमणीयता अद्वितीय होती है।

वनावन

यह जम्मू-कश्मीर राज्य का लोक संगीत है। इसे विशेष रूप से विवाह समारोहों के दौरान गाया जाता है और बहुत ही शुभ माना जाता है।’10

दक्षिण भारत का लोकसंगीत

किसी भी देश की सांस्कृतिक परम्परा में लोकसंगीत व लोकनाट्य का स्थान स्पष्ट है। ये जन साधारण के जीवन में एक महत्त्वपूर्ण कार्य सम्पन्न करते हैं। सभी देशों के लोकसंगीतों में कुछ सामान्य विशेषताएँ मिलती हैं। लोकसंगीत लाखों मूक लोगों का संगीत है। यह पुरुषों व स्त्रियों के समूहों के अधिकृत है। यह थके हुए किसान एवं श्रमिक को असीम आनन्द प्रदान करता है तथा यह एक सुहावना सरल संगीत है। शास्त्रीय संगीत के निर्माताओं में दक्षिण भारत के त्यागराज ने संगीत की महत्त्वपूर्ण सेवा की है। उन्होंने बहुत सी लोकधुनों को जो उनके समय में प्रचलित थीं, अपने खुले रंगमंचों के नाट्यों में अमर करके दिव्य कीर्तन व उत्सव सम्प्रदाय कीर्तन की प्रचुर सेवा की है।11

छत्तीसगढ़ का लोक संगीत

पंडवानी

‘यह लोक संगीत महाकाव्य महाभारत और भीम पर आधारित है। इसमें गायन और वादन (वाद्य यंत्र बजाने) दोनों का समावेश है। सामान्यतः गीत तम्बूरे की ताल पर आधारित होते हैं। इसके सुविदित कलाकारों में से एक छत्तीसगढ़ राज्य की तीजन बाई हैं। संगीत के क्षेत्र में अपने योगदान के लिए उन्हें पद्मश्री (1987) और पद्म भूषण (2003) तथा पद्मविभूषण से भी सम्मानित किया जा चुका है।12

बैगा गीत

बैगा जनजाति का अपना आदिम संगीत है। ये त्योहार विवाह एवं अनेक पर्व में नाच-गान करते है। बैगा जनजाति के लोग दशहरा से वर्षारंभ तक नाच-गान करते है। ये बिना श्रृंगार के नृत्य नही करते है, नृत्य के लिए विशेष वेशभूषा होती है।

मध्य प्रदेश का संगीत

आल्हा

‘यह मध्य प्रदेश राज्य से संबंधित है और यह जटिल शब्दों वाला वीर गाथा गीत है। इसे सामान्यतः ब्रज, अवधी और भोजपुरी जैसी अलग-अलग भाषाओं में गाया जाता है। यह प्रकार भी महाकाव्य महाभारत से संबंधित है क्योंकि इसमें उन नायकों का महिमामंडन करने का प्रयास किया जाता है जिन्हें पांडवों के पुनः अवतार के रूप में देखा जाता है। पांच पांडव भाइयों को आल्हा ऊदल, मलखान, लखन और देव के रूप में इन वीर गीतों में प्रतिस्थापित किया जाता है।

राई

मध्य प्रदेश राज्य के बुन्देली प्रान्त में राई गायिकी का प्रचलन है जिसमें बुंदेलखंड की लोक विधा राई गीत कोयलिया के गीत हैं, जो कोयल की कूक के साथ शुरू होते हैं और कूक के बंद होने पर समाप्त हो जाते हैं। कूक की मिठास और व्यंजना इन गीतों में इतनी समायी है कि इन्हें कोयलिया के गीत कहना भी मान्य होगा ।

पाई गीत

यह गीत अधिकांशतः मध्य प्रदेश से है। इसे विशेष रूप से वर्षा ऋतु के दौरान पड़ने वाले त्योहारों के दौरान गाया होता है। सामान्यतः इन गीतों के माध्यम से अच्छे मानसून और अच्छी फसल के लिए प्रार्थना की जाती है क्योंकि यह किसान समुदायों द्वारा गाये जाते है। सामान्यतः पाई संगीत पर सायरा नृत्य किया जाता है।‘13

निष्कर्ष – उपरोक्त क्षेत्र के लोक संगीत को देख कर ऐसा अनुमान लगाया जा सकता है कि भारतीय परिवेश में लोक की भूमिका जन्मों जन्मान्तर से चली आ रही है, जिसमें संगीत हमारा पूरे भारत में विद्यमान है वो चाहे पूरब हो या पश्चिम व उत्तर हो या दक्षिण  हर दिशा में संगीत के भिन्न –भिन्न कलेवर देखने को प्राप्त होंगे इस शोध-आलेख के माध्यम से लोक संगीत की रूपरेखा को दिखाने की कोशिश की है निष्कर्षतः लोक एवं लोक संगीत का वर्चस्व अनंत तक देखने को प्राप्त होगा ।

सन्दर्भ ग्रन्थ सूची

1. सिंघानिया नितिन, भारतीय कला एवं संस्कृति, संस्करण- तृतीय, पृष्ठ- 5.18 प्रकाशन- एमसीग्राव हील एजुकेशन प्राइवेट लिमिटेड, इंडिया

2. डॉ. स्नेही शिखा, सारस्वत आकांक्षा, यू जी सी नेट संगीत, पृष्ठ – 332, प्रकाशन- अरिहंत इंडिया लिमिटेड

3. डॉ. स्नेही शिखा, सारस्वत आकांक्षा, यू जी सी नेट संगीत, पृष्ठ – 329, प्रकाशन- अरिहंत इंडिया लिमिटेड

4. सिंघानिया नितिन, भारतीय कला एवं संस्कृति, संस्करण- तृतीय, पृष्ठ- 5.20 प्रकाशन- एमसीग्राव हील एजुकेशन प्राइवेट लिमिटेड, इंडिया

5. डॉ. स्नेही शिखा, सारस्वत आकांक्षा, यू जी सी नेट संगीत, पृष्ठ – 327, प्रकाशन- अरिहंत इंडिया लिमिटेड

6. सिंघानिया नितिन, भारतीय कला एवं संस्कृति, संस्करण- तृतीय, पृष्ठ- 5.18 प्रकाशन- एमसीग्राव हील एजुकेशन प्राइवेट लिमिटेड, इंडिया.

7. डॉ. स्नेही शिखा, सारस्वत आकांक्षा, यू जी सी नेट संगीत, पृष्ठ – 326, प्रकाशन- अरिहंत इंडिया लिमिटेड

8. सिंघानिया नितिन, भारतीय कला एवं संस्कृति, संस्करण- तृतीय, पृष्ठ- 5.20 प्रकाशन- एमसीग्राव हील एजुकेशन प्राइवेट लिमिटेड, इंडिया

9. सिंघानिया नितिन, भारतीय कला एवं संस्कृति, संस्करण- तृतीय, पृष्ठ- 5.21 प्रकाशन- एमसीग्राव हील एजुकेशन प्राइवेट लिमिटेड, इंडिया

10. डॉ. स्नेही शिखा, सारस्वत आकांक्षा, यू जी सी नेट संगीत, पृष्ठ – 328, प्रकाशन- अरिहंत इंडिया लिमिटेड

11. डॉ. स्नेही शिखा, सारस्वत आकांक्षा, यू जी सी नेट संगीत, पृष्ठ – 326, प्रकाशन- अरिहंत इंडिया लिमिटेड

12. सिंघानिया नितिन, भारतीय कला एवं संस्कृति, संस्करण- तृतीय, पृष्ठ- 5.21, प्रकाशन- एमसीग्राव हील एजुकेशन प्राइवेट लिमिटेड, इंडिया

13. सिंघानिया नितिन, भारतीय कला एवं संस्कृति, संस्करण- तृतीय, पृष्ठ- 5.23, प्रकाशन- एमसीग्राव हील एजुकेशन प्राइवेट लिमिटेड, इंडिया

Abstract

India is a geographically diverse nation, and this diversity is reflected in Indian culture. Each of our states has its own form of music.It is the basis of their cultural affirmation. While the rules laid down in the Natyashastra are followed and the guru-shishya (student-teacher) tradition is nurtured, folk music is the music of the people andThere are no strict rules. Folk music covers a wide variety of themes and is rich in musical rhythms.These can also be based on rhythms. There are many types of folk music associated with a particular state.1 Folk music is not the heritage of any particular place, but is today sung in open courtyards state accessible to the masses.Today, folk festivals are held everywhere, where folk artists from various regions of India bring their own folk songs and dance styles. Folk music is pervasive in people’s lives.The music of any country or region reflects the civilization and culture of its folk life. Folk music and folk culture are inextricably linked, and folk culture cannot be separated from folk music. Based on this, we are making some observations.

Peer-Review Method

This article underwent double-blind peer review by two external reviewers.

Competing Interests

The author/s declare no competing interests.

Funding

This research received no external funding.

Data Availability

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Place of Folk Music in the Indian Context © 2025 by  Vaibhav Kaithwas and Lala Ram  is licensed under CC BY-NC-ND 4.0. Published by ShodhManjusha.