आधुनिक युग में भक्तियोग: श्रीमद्भगवद्गीता के परिपेक्ष्य में
Bhaktiyoga in the Modern Era: in the Context of Srimad Bhagavad Gita
2025, Vol.02, Issue 01 Pages 20-28
Kumar, Narender👤 ✉ ORCID: | DOI: https://doi.org/10.70388/sm240116
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Citation
Kumar, N.(2025) आधुनिक युग में भक्तियोग: श्रीमद्भगवद्गीता के परिपेक्ष्य में. Shodh Manjusha: An International Multidisciplinary Journal, 02(01), 20-28. https://doi.org/10.70388/sm240116
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सारांश
पुरातन समय में श्रीमद्भगवद्गीता का विशेष स्थान रहा है | जिस प्रकार मानव के जीवन में वेद, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद,महाकाव्य आदि सभी ग्रंथो का अपना विशेष महत्व रहा है | उसी प्रकार इस संसार में आज भी सभी ग्रन्थों में सर्वत्र गीता का आदर है | यह किसी भी विशेष धर्म–सम्प्रदाय का साहित्य नहीं बन सकी, क्योंकि यह तो भारत में प्रकट हुई समस्त विश्व की धरोहर है |जो कि आज भी मानव इसे सबसे ज्यादा महत्व देता है, आज के समय में मानव अपने कर्मो को भूल गया है | वह अपने कर्मो से दूर भागता है ,क्योंकि आज का मानव स्वार्थी हो गया है | वह अच्छे कर्म न करके बुरे कर्मो की तरफ दौड़ता है | इसका कारण यह है कि मनुष्य ईश्वर की भक्ति करना भूल गया है | आज के मनुष्य को अपने मूल संस्कारो के बारे में पता नहीं है | मनुष्य को अपने जीवन के उद्देश्य, लक्ष्य ,एवं कर्मो का निर्वहन करना ही छोड़ दिया है | आज मानव का मान – सम्मान उसके कर्मो के कारण बिल्कुल ही कम हो गया है , गीता में मानव के सभी जीवन मूल्यों के बारे में बताया गया है भगवान श्रीकृष्ण गीता मेंअर्जुन कोयुद्धके समयकर्म सिद्धान्त की व्याख्या करते हुए कहते है कि प्रत्येक प्राणी कर्मबन्धन में बंधाहु आहै,
वहबिनाकर्मकिएरहनहींसकताअर्थात्कर्मनकरनेवालाप्राणीभीतोअकर्मकीश्रेणीमेंआजाताहैपरन्तुयहभीतोकर्मनकरने’काकर्मकरताहैअर्थातकोईभीमनुष्यकर्म–अकर्मविकर्मसेनहींबचसकता,कर्मतोकरनाहीहोगाअपनेविवेकज्ञानकेआधारपरकौनसेकर्मकरनेहैइसकाचयनकरनाकिएजातेहैनिष्कामकर्मकहलातेहै|
हिन्दू धर्म में भक्ति योग से आशय अपने इष्ट देवता में अनुराग रख कर आन्तरिक विकास करने से है। भजन कीर्तन व सत्संग करना। इसे ‘भक्ति मार्ग’ भी कहते हैं। यह उन तीन मार्गों में से एक है, जिससे मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है। अन्य दो मार्ग हैं- ज्ञान योग तथा कर्म योग।
भक्ति की परम्परा बहुत पुरानी है। श्वेताश्वतर उपनिषद में ‘भक्ति’ का उल्लेख है। भगवद्गीता में मोक्ष के तीन मार्ग बताए गए हैं जिनमें से भक्तियोग एक है।
मुख्यशब्द : भक्ति ,धर्म ,मन ,योग ,पाप-पुण्य ,मृत्यु ,मोक्ष |
भूमिका
आधुनिक युग में वेद, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद एवं गीता आदि सभी ग्रंथो का अपना विशेष महत्व रहा है | संसार में आज सर्वत्र गीता का आदर है | यह किसी भी धर्म-सम्प्रदाय का साहित्य नहीं बन सकी, क्योंकि यह तो भारत में प्रकट हुई समस्त विश्व की धरोहर है | श्रीमद्भगवद्गीता का हमारे जीवन मे महत्त्वपूर्ण स्थान है, जिस प्रकार एक कार, एक बाईक, और एक बस आदि मे तेल का महत्व है क्योंकि तेल के बिना ये सभी साधन नहीं चल सकते हैं, उसी प्रकार मनुष्य जीवन के लिए भगवद्गीता का महत्व है, इसके बिना मनुष्य का जीवन व्यर्थ है अर्थात् मनुष्य अपने जीवन में इसके बिना आगे नहीं बढ़ सकता। वह अपने जीवन को शिक्षाप्रद व सफल नहीं बना सकता। अतः मनुष्य के जीवन को किस दिशा में ले जाना है या मनुष्य को किस साधन के माध्यम से सफलता प्राप्त होगी ? यह सारा सार गीता में ही विद्यमान है |
जीवनकाउद्देश्य– इस संसार मे जो भी वस्तु बनायी गई है सबका एक उद्देश्य है जैसे कि घर, गाडी, बैंक, पैन आदि सबकी अपनी-अपनी उपयोगिता है और अपना-अपना उद्देश्य है | मनुष्य का भी अपना एक स्थान है जिसके अन्दर बुद्धि होती है इन सबका कोई न कोई उद्देश्य है सब कुछ उद्देश्य-पूर्ण बनाया गया है अत: इन सबका माध्यम भगवद्गीता है जो कि सभी को अपने कार्य मे लगाये हुये है | इसलिए गीता कोई विशेष वर्ग के लिए नहीं है यह तो समस्त मानव – विशेष के लिए है यह हमे धर्म के अर्थ व गुण को सिखाती है, इसलिए धर्म एक ऐसा गुण जिसे उस वस्तु से अलग नहीं किया जा सकता है जैसे: कि चीनी का धर्म-मिठास, अग्नि का धर्म उष्णता, पानी का धर्म तरलता । इसलिए इन सबके धर्म को इनसे अलग नहीं किया जा सकता। अत: मानव का धर्म है भगवान की भक्ति करना, उसी प्रकार यह भी मनुष्य से अलग नहीं हो सकता है अतः श्रीमद्भगवद्गीता कोई धर्म की पुस्तक नहीं है यह तो मानव के उद्देश्य को बताती है | अत: गीता में भक्ति करना ही अपना कर्म बताया गया है |
वेदोंकासार – मनुष्य का शरीर एक मशीन की तरह है इसको कैसे चलाना है? यह हमें वेदों से पता चलता है जिसका सार है श्रीमद्भगवद्गीता । मनुष्य अपने जीवन में जो भी कार्य करता है, या जो भी जीवन में शिक्षा व रोजगार ग्रहण करता है इन सब के पहलुओं के पीछे गीता का सार ही महत्त्वपूर्ण योगदान रखता है। हमारे देश व विदेश में अनेकों विद्वान पैदा हुए और आगे भी होंगे | सभी विद्वानों व वैज्ञानिकों के प्रश्नों का उत्तर इसी श्रीमद्भगवद्गीता से ही प्राप्त होता है |
भगवान श्रीकृष्ण ने 5300 वर्ष पूर्व यह संवाद कुरुक्षेत्र की युद्ध-भूमि में दिया, तो आज हर व्यक्ति तनाव का जीवन जीता है लेकिन यह नहीं जानता कि तनावों से मुक्ति कैसे पाई जाये ? कुरुक्षेत्र के युद्ध में अर्जुन सबसे अधिक तनाव में थे और तब श्रीकृष्ण जी ने अर्जुन को श्रीमद्भगवद्गीता का उपदेश दिया। क्योंकि गीता के उपदेश से पहले अर्जुन के मन की स्थिति अलग थी वह युद्ध नहीं करना चाहता था और उपदेश के बाद उसके मन की स्थिति ही बदल गई और युद्ध किया व विजय प्राप्त की। और जीवन के तनाव से छुटकारा प्राप्त किया। क्योंकि इसके पीछे कारण अर्जुन की भक्ति ही तो है इसलिए गीता से ही समस्या का समाधान है और हमें निर्मल आचरण में रहने व अनुसरण का भी ज्ञान यही से प्राप्त होता है |
पुरातनसमयमेंमनुष्यकीभक्ति – मानव पुराने समय में बहुत ही भक्ति करने वाला था | वह अपने सारे कार्य समय और नियम से करता था | उसकी एक दिनचर्या थी ,सुबह से लेकर शाम तक की | लेकिन आज का मानव अपनी दिनचर्या को भूल गया है ,भगवान का नाम लेना ही भूल गया है | वह अपना सारा समय व्यर्थ की बातों और कार्यो में निकाल देता है ,जिसके कारण मनुष्य अपने अच्छे कर्मो को भूल गया है और अपना जीवन नरक बना लिया है | पुराने समय का जीवन इस प्रकार है –
1. सुबह समय पर उठना और रात में समय पर सो जाना ।
2. शौच, स्नान, पूजा-पाठ एवं भक्ति आदि ।
3. दिनभर राम नाम में वयस्त रहना ।
4. मिलकर भक्ति जीवन यापन करना ।
5. पारिवारिक कर्तव्यों का पालन करना |
6. शुद्ध एवं साकाहारी भोजन ग्रहण करना ।
7. लडाई-जगड़े एवं दंगों से दूर रहना ।
8. उच्च विचारों के साथ जीवन व्यतीत करना ।
9. आस-पास के सभी व्यक्तियों का सम्मान करना ।
10. कार्यों का आपस में मिल बांट कर करना ।
आधुनिकसमयमेंमनुष्यकीभक्ति – मशीनीकरण के युग को ही आधुनिक कहा जाता है और जो मनुष्य शहरों में रहते है उनकी जीवन शैली को आधुनिक जीवन शैली कहा जाता है। इस नवीन जीवन शैली में मानव ने अपनी सुख-सुविधाओं के लिए सभी तरह का विकास किया है जैसे मकान बनाने की तकनीक, संचार तकनीक, सम्प्रेषण तकनीक, विद्युत चलित उत्पाद आदि। यहाँ यह सोचने-समझने की बात है कि हमने मशीनीकरण को अपनाकर क्या गलत किया ? बस यही पर हमारा चिन्तन शुरू होता है कि हमने क्या गलती की ? इस युग में मनुष्य ने सभी सुख-सुविधाओं की वस्तुएं को तो बना लिया परन्तु इससे उसे आराम मिला बस यही ‘आराम’ उसके लिए अभिशाप बन गया |
पुराने समय में सारे काम करने से पहले भगवान का नाम लिया जाता था | जैसे कि मनुष्य के लिए खेती करना, हल जोतना, वजन उठाना, पशुओं का चारा लाना, दूर तक पैदल जाना, कुश्ती करना इत्यादि। महिलाओं के लिए चूल्हा जलाकर रसोई का कार्य करना, कपड़े धोना, घर के आंगन में गोबर लीपना, चक्की चलाकर गेहूं पीसना, बच्चों को लालन-पालन वृद्धों की सेवा करना इत्यादि। इन सभी कार्यों में शारीरिक श्रम बहुत ही ज्यादा है तो इसीलिए हर अच्छा कार्य करने से पहले मानव भक्तिपूर्ण कार्य करता था | जो वर्तमान जीवन में नहीं है क्योंकि आज वाशिंग मशीन, गैस-चूल्हा, घरों में फर्श का होना, खेलों में रूचि कम लेना, दूरभाष का अधिक प्रयोग, खेती न करना, आटा चक्की का न होना इत्यादि | मानव सभी कार्य केवल पैसो के लिए करता है ,उसके सारे धार्मिक संस्कार समाप्त होते जा रहे है | जो कि कुछ निम्न प्रकार है-
1. सुबह लेट उठना व रात्रि में लेट सोना ।
2. धन इक्ट्ठा करना, सुख-सुविधाएं खोजना इत्यादि |
3. मानव द्वारा एक-दूसरे को नीचा दिखाना |
4.तनाव भरा जीवन गुजरना।
5.संयुक्त परिवरों का विभाजन।
6. अपनी भक्ति न करना ।
7.आलस भरा जीवन व्यतीत करना |
8. आकर्षित दुनिया की चाह रखना |
9. माता-पिता का आदर न करना |
10. वृद्ध-आश्रमों की संख्या में बढ़ोतरी |
श्रीमद्भगवद्गीताकावर्तमानमेंसंदेश – वर्तमान समय में मनुष्य अनेक प्रकार की समस्याएं से जूझ रहा है | सभी समस्याओं के निवारण के लिए मनुष्य इस संसार में इधर-उधर भटकता फिरता है, लेकिन मनुष्य सभी समस्याओं का निवारण नहीं कर पा रहा है | सबसे पुराना ग्रन्थ श्रीमद्भगवद्गीता मानव की सभी समस्याओं का निवारण करने का मूल आधार है | इसमें भगवान की भक्ति करने का सन्देश भी दिया गया है ,जो कि मानव को अच्छे संस्कार प्रदान करता है | गीता निम्न प्रकार मानव की सहायता करती है –
1. मनुष्य को जीवन दायक प्रेरणा देती है।
2. सुख,संतोष और शांति का अनुभव कराती है।
3. गीता मनुष्य जीवन के लक्ष्य को निर्धारित करती है।
4.यह समय पर कार्य करने के लिए प्रेरित करती है।
5. यह यज्ञ, जप, तप, दान एवं भक्ति का मर्मत्व सीखाती है।
6. गीता कर्म और अकर्म की स्थिति की विवेचना करती है।
7. यह मोक्ष प्राप्ति के मार्ग का वर्णन करती है।
8. गीता श्रेष्ठ आचरण का प्रतिपादन करती है।
9. यह जीव-जीवात्मा सम्बन्ध को उजागर करती है।
10. गीता कर्मयोग, भक्तियोग और ज्ञानयोग का निरूपण करती है।
गीताकेअनुसारभक्ति – श्रीमद्भगवद्गीता की उपयोगीता समस्त मानव समाज के लिए प्रासंगिक है। श्रीमद्भगवद्गीता ही एक ऐसा मूल ग्रन्थ है जिसमें सृष्टि के समस्त आध्यात्मिक पक्षों का समावेश है, जिनको पूर्ण रूप से समझ लेने पर भारतीय चिन्तन का समस्त सार ज्ञात हो सकता है। श्रीमद्भगवद्गीता ग्रन्थ को ‘प्रस्थानत्रय’ माना जाता है। ‘उपनिषद्’ अधिकारी मनुष्यों के काम की चीज है और ‘ब्रह्मसूत्र’ विद्वानों के काम की , परन्तु श्रीमद्भगवद्गीता सभी के काम की चीज है।
1. दायित्वोंकानिर्वहन – मनुष्य के कर्तव्यों को व्यक्तिगत, पारिवारिक एवं सामाजिक तीन हिस्सों में विभक्त किया जा सकता है। श्रीमद्भगवद्गीता में भी श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को तीनों प्रकार के दायित्वों का निर्वहन करने की आज्ञा दी जाती है। श्रीकृष्ण अर्जुन को कहते है कि हे अर्जुन ! तुम्हें यह कायरता वाली बातें शोभा नहीं देती है, तुम्हें अपने क्षत्रिय धर्म का पालन करते हुए युद्ध करना चाहिए। युद्ध न करने से तू अपयश को प्राप्त होगा। आगे वह अर्जुन को कर्म सिद्धान्त की व्याख्या करते हुए कहते है कि प्रत्येक प्राणी कर्म बन्धन में बंधा हुआ है, वह बिना कर्म किए रह नहीं सकता अर्थात् कर्म न करने वाला प्राणी भी तो अकर्म की श्रेणी में आ जाता है परन्तु यह भी तो ‘कर्म न करने’ का कर्म करता है अर्थात कोई भी मनुष्य कर्म-अकर्म-विकर्म से नहीं बच सकता, कर्म तो करना ही होगा। अपने विवेक ज्ञान के आधार पर कौन से कर्म करने है इसका चयन करना चाहिए। कर्तव्यों का निर्वहन करते समय, पाप-पुण्य का विचार नहीं किया जाता। अपने कर्तव्यों के त्याग की न तो धर्म आज्ञा देता है और न ही अध्यात्म कहता है। वह कर्म जो बिना फल की इच्छा के किए जाते है निष्काम कर्म कहलाते है अर्थात् जो मुझे समर्पण कर या मेरे आदेश का निर्वहन समझकर किए जाने वाले कर्म है, उनका जीव को पाप-पुण्य नहीं लगता। तू फल की इच्छा तो त्यागकर, अपने कर्तव्यों सहित सभी कर्मों को मुझे समर्पित करता हुआ कर्म कर, ऐसा करने से तू सर्वथा सभी पाप-पुण्यों से बच जाएगा । श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कर्म के विषय में कहा है – कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन | मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि || आज गीता जीवन का तत्वज्ञान बताती है। गीता में कर्मयोग जिसे संतश्रेष्ठ ज्ञानेश्वर भगवान ने स्वधर्म कहा है। जो हर मानव को अपने-आप पर सवाल करने को मजबूर करता है। क्या मैं स्ववर्म से जी रहा हूँ ? स्वधर्म मतलब अपने कर्तव्य। मानलो एक डॉक्टरने एक मरिज को इन्जेक्शन लगाया, उसको काफी दर्द भी हुआ तोभी डॉक्टर को पाप नही लगेगा क्योकी वह डॉक्टर का स्वधर्म है। भले ही मरिज को कुछदेर दर्द हो लेकीन आखिरकार उसे बिमारीसे छुटकारा मिलेगी। दुसरा उदाहहण लेते है। एक गृहणी /हाऊस वाईफ है। उसका स्वधर्म क्या है । घरके सभी का ध्यान रखना, बच्चों की पढाई, संस्कार, खानेपिने का ध्यान रखना। घरके बडेबूढ़े की देखभाल करना। अपने पती का ध्यान रखना । घर आए मेहमानोकी खातिरदारी करना। और ये सब जिम्मेदारी का कार्य करते समय प्रसन्न रहना। मानो भगवान की सेवा कर रही है। पोलीस का स्वधर्म है उन्होंने चोरोंसे जनताकी जानमालसे रक्षा करें। इमानदारी से काम करे। ऐसे सारे लोगोंके स्वधर्म से बारेमे बताया जा सकता है। नोकरी करना शुद्र मे आता है, उनको ऐसी नोकरी करना बाहिए की मालिक / सरकार खुश हो । एक मिनटभी अपने जिम्मेदारी का समय बरबाद न करें। अगर हर कोई स्वधर्म का पालन करना शुरु करे तो जिस प्रकार अनेक छोटे छोटे पुजों का यंत्र / मशिन सुचारु रुप से चलता है। उसी प्रकार अपना समाजभी सुकून से खुशहाल होकर जी सकता है।
2. मानसिकशांति – आज के तनाव भरे जीवन में मनुष्यों को अनेक मानसिक रोगों ने घेरा हुआ है। मनुष्य आज मानसिक विकृति का शिकार हो चुका है। मनुष्यों को नहीं पता है कि वह क्या कर रहें है और क्यों ? मनुष्य सोचता है कि हमारी दिशा क्या है ? यही नहीं मनुष्य आधुनिक शहरीकरण में अपने आप को अकेला और असुरक्षित समझता है। जिससे उसके दिमाग में कुंठा घर कर जाती है। जिससे आसक्ति बढ़ती है और राग, ईर्ष्या आदि का जन्म होता है यह सभी मानसिक दोष है। श्रीमदभगवद्गीता में मानसिक रोगों के निवारण हेतु जप, तप, भक्ति,यज्ञ व दान की महिमा का भी वर्णन हुआ है। इससे आगे भी जब कुछ रास्ता न मिलें तो सब-कुछ ईश्वर पर छोड़ते हुए निष्काम कर्म करों जिससे आत्मसंतुष्टि मिलेगी और आत्मविश्वास बढ़ेगा | इस पर भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन का मानसिक तनाव को दूर करते हुए उपाय बताता है –
1.जिंदगी में तनाव मुक्त रहने के लिए सबसे पहले श्रीकृष्ण की ये बात जरूर गांठ बांध लें, कि भविष्य की चिंता व्यर्थ और वर्तमान में जीना सर्वोचित है। गीता में श्रीकृष्ण ने कहा है कि बीते हुए कल और आने वाले कल के बारे में सोचकर कुछ हासिल नहीं किया जा सकता है। इससे केवल आपका मन अशांत रहता है। वर्तमान में अच्छे कर्म करने पर अधिक ध्यान देना चाहिए।। इससे आपका भविष्य अपने आप बेहतर हो जाएगा।
2.दरअसल हमारा मन ही हमारे दुखों का कारण होता है। श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं कि जिस व्यक्ति ने अपने मन पर काबू पा लिया वह व्यर्थ की चिंता और इच्छाओं से भी मुक्त हो जाता है। ऐसा व्यक्ति अपने लक्ष्य पर भी आसानी ध्यान केंद्रित कर सकता है और उसे हासिल कर सकता है।
3.कोई भी व्यक्ति पूरी तरह से परफेक्ट नहीं होता। हर किसी से कभी न कभी गलतियां होती हैं। ऐसे में अपनी गलतियों और हार से सीख लेकर आगे बढ़ना चाहिए। इससे निराश होकर मन को दुखी नहीं करना चाहिए। इससे किसी भी समस्या का हल नहीं होता, बल्कि आप परेशान होने लगते हैं।
4.कभी भी अपनी तुलना किसी अन्य व्यक्ति से न करनी चाहिए। श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो व्यक्ति अपनी तुलना दूसरों से करता है वह कभी खुश नहीं रहता। आप जैसे हैं वैसे ही खुद को स्वीकार करना चाहिए।
5.गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि मनुष्य को खुद को ईश्वर में लीन कर देना चाहिए। पूरे जग में भगवान के सिवाय मनुष्य का कोई नहीं होता। मनुष्य को हमेशा यह मान कर कर्म करना चाहिए कि वह भी किसी का नहीं है।
3. स्वस्थजीवन – आधुनिक जीवन इतना व्यस्त है कि मनुष्य के पास अपने लिए समय ही नहीं है। कुछ मनुष्य तो ऐसे है जिन्होंने प्रातः कालीन सूर्य की आभा को कई वर्षों से देखा तक नहीं; ऐसे में मनुष्यों का स्वास्थ्य रूग्ण तो होगा ही। रोग सर्वप्रथम मन में घर करते है उसके बाद शरीर में अर्थात् यह माना जाता है कि मनुष्य के सभी रोग मनोकायिक होते है परन्तु यह भी देखा गया है कि जैसा हम आहार लेते है उसका प्रभाव भी हमारे मन पर पड़ता है। इसलिए श्रीमदभगवद्गीता में योग करने की सलाह दी गयी है और कहा गया है कि योग उसी का सिद्ध होता है जो समय पर अभ्यास करता है, समय पर भोजन ग्रहण करता, जरूरत से अधिक परिश्रम नहीं करता है, न अधिक सोता है और न अधिक जागता ही है अर्थात् श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार समय प्रबन्धन से मनुष्य सफल होता है।
4. सदाचरण – सदाचरण संस्कृत के सत् एवं आचरण से मिल कर बना है। जिसका अर्थ होता है सज्जनों जैसा आचरण या व्यवहार । श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण यानी जो-जो काम करते हैं, दूसरे मनुष्य (आम इंसान) भी वैसा ही आचरण, वैसा ही काम करते हैं। वह (श्रेष्ठ पुरुष) जो प्रमाण या उदाहरण प्रस्तुत करता है, समस्त मानव-समुदाय उसी का अनुसरण करने लग जाते हैं। यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन:। स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ||
सदाचरण एक नैतिक गुण है जिसके लिए चरित्र की पवित्रता का होना बहुत जरूरी होता है। आधुनिक जीवन शैली में सामाजिक गठबंधन टूट रहा है। मनुष्य अपने स्व-नियंत्रण में नहीं है। जहाँ-तहाँ क्रोध का साम्राज्य फैला नज़र आता है। मनुष्यों को अपनी-अपनी मर्यादाओं व रिश्तों का भान नहीं है। श्रीमद्भगवद्गीता मनुष्यों के गुणों का वर्णन दो विभागों के रूप में करते है श्रीकृष्ण कहते कि हे अर्जुन ! गुण दो प्रकार है दैवीय गुण और राक्षसी गुण। मनुष्यों को दैवीय गुणों का आचरण करना चाहिए और राक्षसी गुण वाले मनुष्यों की उपेक्षा करनी चाहिए। गीता में शास्त्र विपरीत आचरण को त्यागने और मानव धर्म की रक्षा करने के लिए प्रेरणा मिलती है – परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुस्कृताम् । धर्म-संस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ।|
5. भक्तिसेमुक्ति – मनुष्य का जब सांसारिक बन्धनों से मोह बना रहता है तब वह अपने जीवन में भटकाव, द्वंद्व, निराशा, अंधकार आदि की दशा को प्राप्त करता है। ऐसी स्थिति में श्रीमद्भगवद्गीता ही एक अच्छा सहारा है जो कि ईश्वर की शरण में जाने एवं मोक्ष प्राप्ति के अनेक साधनों का वर्णन करता है। मोक्ष को अध्यात्म का निर्धारित लक्ष्य माना जाता है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण मोक्ष प्राप्ति के चरम लक्ष्य को प्राप्त करने के अनेक उपाय जैसे कर्मयोग, भक्तियोग, ज्ञानयोग आदि बताते है। उनकी विधियों में वह निष्काम कर्म करने की बात कहते है। ध्यान का अभ्यास और वैराग्य प्राप्ति की बात कहते है। वह निश्छल श्रद्धायुक्त भक्ति की बात भी कहते है। और तात्विक विवेचन करते हुए कहते है कि सभी मार्गों से जीव मुझ तक पहुंच जाता है। हजारों मनुष्यों में कोई एक मुझे भजता है और उन जैसे हजारों में से कोई एक मुझको प्राप्त होता है। इसलिए हे अर्जुन श्रद्धायुक्त, शास्त्रोक्त आचरण करते हुए जो मनुष्य मुझ में ध्यान एवं भक्ति रखता हुआ निष्काम भाव से कर्म करता है, वह मुझे ही प्राप्त होता है ऐसा भगवान श्रीकृष्ण कहते है – यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति । शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः।। जो न कभी हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न कामना ही करता है तथा जो शुभ और अशुभ सम्पूर्ण कर्मों के फल का त्यागी है, जहाँ कोई शुभ विलग नहीं है, अशुभ शेष नहीं है, भक्ति की इस पराकाष्ठा से युक्त वह पुरुष मुझे प्रिय है। अर्थात् ऐसी भक्ति करता हुआ मानव मुझे आसानी से प्राप्त कर लेता है | वह मानव सदा आनंद ही प्राप्त करता है |
निष्कर्ष– अतः कहा जा सकता है कि श्रीमद्भगवद्गीता प्रत्येक स्थिति में जीवनभर मनुष्यों का मार्ग प्रशस्त करती है। मनुष्यों के जीवन में आने वाले प्रत्येक पड़ाव चाहे वह मानसिक हो, शारीरिक हो, सामाजिक हो, व्यापारिक हो, सुख-दुःख हो इत्यादि में श्रीमदभगवद्गीता ही मनुष्यों को शांति, भक्ति एवं मोक्ष प्रदान करती है। श्रीमद्भगवद्गीता का शाश्वत ज्ञान अखण्ड है।
संदर्भग्रन्थसूचि –
1. श्रीमद्भगवद्गीता – गीता प्रेस गोरखपुर
2. श्रीमद्भगवद्गीता – आर्ष साहित्य प्रचार ट्रस्ट, दिल्ली
3. श्रीमद्भगवद्गीता (यथार्थ गीता) – मोगरा लेन अंधेरी (पूर्व) मुंबई
4. रामायण – आर्ष साहित्य प्रचार ट्रस्ट, दिल्ली
5. उत्तररामचरितम – मोतीलाल बनारसीदास, दिल्ली
6. भारतीय दर्शन – मोतीलाल बनारसीदास, दिल्ली
7. ऋगवेद – आर्ष साहित्य प्रचार ट्रस्ट, दिल्ली
8. यजुर्वेद – आर्ष साहित्य प्रचार ट्रस्ट, दिल्ली
9. सामवेद – आर्ष साहित्य प्रचार ट्रस्ट, दिल्ली
10. अथर्ववेद – आर्ष साहित्य प्रचार ट्रस्ट, दिल्ली
About Author
Dr Narender Kumar is working as an Assistant Professor at the Department of Sanskrit at NIILM University Kaithal Haryana. He is a prominent scholar in the Sanskrit subject having 5 years of research experience and participated in various National and International Conferences.
Impact Statement
In Hindu religion, Bhakti Yoga means internal development by having affection for one’s favorite deity. Doing bhajan, kirtan and satsang. It is also called ‘path of devotion’. This is one of the three paths through which one can attain salvation. The other two paths are – Gyan Yoga and Karma Yoga. The tradition of devotion is very old. There is mention of ‘Bhakti’ in Shwetashvatara Upanishad. There are three paths to salvation mentioned in the Bhagavad Gita, of which Bhaktiyoga is one.
Abstract
Srimad Bhagavad Gita has had a special place in ancient times. Just as all the texts like Vedas, Brahmins, Aranyakas, Upanishads, epics etc. have their own special importance in human life. Similarly, even today in this world, Geeta is respected everywhere in all the scriptures. It could not become the literature of any particular religion or sect, because it is the heritage of the entire world that appeared in India. Which even today man gives the most importance to, in today’s time man has forgotten his deeds. He runs away from his actions because today’s man has become selfish. Instead of doing good deeds, he runs towards bad deeds. The reason for this is that man has forgotten to worship God. Today’s man is not aware of his original values. Man has stopped fulfilling his life’s purpose, goal and deeds. Today the respect of human beings has reduced completely due to their deeds, all the life values of human beings have been explained in Geeta.
